"अभी तो पूरे प्रावधान ही लागू नहीं हुए" जगदानंद

जगदानंद राज्य सूचना आयुक्त, उडीसा

सूचना अधिकार कानून को दो अहम उद्देश्य से लागू किया गया था। पहला यह कि इससे व्यवस्था में शुचिता और जवाबदेही लाई जा सकेगी जिससे पारदर्शिता बढ़े और भ्रष्टाचार कम हो जाए। दूसरा मकसद यह था कि जितनी सरकारी संस्थाएं हैं या फिर वैसी संस्थाएं हैं, जो सरकार से मदद लेती हैं और संविधान द्वारा सत्यापित की गई हैं, उन्हें अपनी-अपनी कार्यपण्राली और कार्यक्रम और सम्बन्धित नियमों को 120 दिनों के अंदर वेबसाइट पर डालना था। इसके अलावा कोई भी नागरिक अगर कोई सूचना चाहे तो उसे 30 दिनों के अंदर मुहैया कराना था। छह साल बाद भी इस दूसरे पहलू पर काफी काम बाकी है। अगर सरकारी विभाग और संस्थाएं इस काम को सही ढंग से पूरा कर लेती तो कई मामलों में सूचना मांगे जाने की जरूरत ही नहीं होती। इस कानून के तहत पंचायत से लेकर संसद तक की कार्यपण्राली और कामकाज को कम्प्यूटराइजेशन करने की बात शामिल थी। छोटे से लेकर बड़े काम तक ऑनलाइन दस्तावेज बन जाता है, जिसे कोई भी इंटरनेट के जरिए देख सकता था लेकिन यह काम अभी तक नहीं हो पाया है। हालांकि समाज में आरटीआई एक्ट को लेकर एक माहौल जरूर बना है। सरकारी कामकाज पर गलती होने पर सवाल उठ रहे हैं। लोग बाग आरटीआई के जरिए सरकारी कामकाज के बारे में तरह-तरह के सवाल भी पूछ रहे हैं लेकिन यह शहरी इलाकों में कहीं ज्यादा हो रहा है। देश की ग्रामीण आबादी अब भी इस कानून का पूरा लाभ नहीं उठा रही है। गांवों में चले जाइए या फिर आदिवासी बहुल इलाकों में जाकर देखिए तो पता चलेगा वहां के लोगों को इस कानून के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। जिन लोगों के पास थोड़ी-बहुत जानकारी है, उनमें भी यह समझ नहीं है कि इस कानून का इस्तेमाल कैसे करें? कहां से जानकारी मांगें? कहां फीस जमा करनी है और वह जानकारी कैसे हासिल होगी? इसकी वजह यही है कि सरकार को इस कानून का जितना प्रचार-प्रसार करना चाहिए था, वह नहीं हो पाया है। हालांकि कुछ राज्यों में इसको लेकर सराहनीय काम जरूर हुए हैं। मसलन, बिहार सरकार ने अपने जानकारी सेंटर की व्यवस्था की है, जहां एक टेलीफोन कॉल पर ही आपका आरटीआई रजिस्टर हो जाता है। यह एक अच्छी व्यवस्था है। मेरे राज्य उड़ीसा में कई सामाजिक संस्थाएं आरटीआई क्लीनिक चलाती हैं, जहां वे आदिवासी और गरीब लोगों तक इस कानून के इस्तेमाल के बारे में जानकारी देते हैं। एक सिटीजन असिस्टेंस सेंटर का हर पंचायत में होना जरूरी है, तभी पूरे लोग इस कानून का लाभ ले पाएंगे। एक बड़ी मुश्किल अब भी बनी हुई है- वह है सरकारी विभागों में काम करने वाले लोगों की मानसिकता है। जो सरकारी गोपनीयता अधिनियम का हवाला देकर जानकारी को छुपाने की मानसिकता से अभी तक उबर नहीं पा रहे हैं। इसलिए कभी- कभी आरटीआई आवेदन पत्र पर सरकारी विभाग की पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि किस चीज को आधार बनाकर जानकारी देने से मना कर दिया जाए। सूचना अधिकारियों की नियुक्ति को सही ढंग से प्रशिक्षण देने की जरूरत है। इस कानून में एक और बात शामिल थी। धारा 4 (1 ) के तहत एक महत्त्वपूर्ण पहलू भी शामिल था, जिसके तहत कहा गया था कि कोई भी नीति या नियम जो एक साथ बहुत सारे लोगों के जीवन को प्रभावित करता है, उसे लागू करने से थोड़े पहले से आम लोगों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराना चाहिए, इससे आम लोगों की प्रस्तावित नियमों पर क्या प्रतिक्रिया होती है, इसका फीडबैक मिल जाएगा और इस फीडबैक के आधार पर कानून या नियम में तर्कसंगत बदलाव करना संभव होगा। यह भी अभी तक नहीं हो पाया। अगर ऐसा हो जाता है तो लोग और प्रशासन के बीच आपसी रिश्ता ज्यादा सहज हो पाता। इसके अलावा प्रत्येक सरकारी विभाग के लिए इस कानून की धारा 4 (1) के तहत यह भी प्रावधान है कि वह कामकाज पण्राली के बारे में वह आमलोगों को सूचना पट्ट के जरिए सूचित करें। मान लीजिए किसी को नगर निगम से अपने मकान का नक्शा पास कराना है तो नगर निगम में इस बात की सूचना पहले से उपलब्ध होनी चाहिए कि आपको मकान का नक्शा कितने दिन के अंदर मंजूर होगा। तभी लोगों को किसी काम को लेकर दफ्तरों के लगातार चक्कर काटने और रित देने का सिलसिला बंद होगा। यह काम अभी भी सरकारी दफ्तरों में नहीं हुआ है। इस कानून के सुचारु तरीके से लागू कराने के लिए देश भर में कमीशन बने हुए हैं। केंद्र में केंद्रीय सूचना आयुक्त हैं तो राज्यों में भी सूचना आयुक्त हैं। इनके जिम्मे मुख्यत: दो काम हैं-एक तो मामलों को जल्दी से निपटाने की व्यवस्था करनी है और आरटीआई एक्ट के ऊपर भी निगरानी रखनी है। दूसरी जिम्मेदारी यह है कि आरटीआई एक्ट कैसे चल रहा है, इस पर सरकारों को अपनी रिपोर्ट देनी होती है। केंद्रीय सूचना आयुक्त हर साल संसद को अपनी रिपोर्ट देते हैं जबकि राज्य सूचना आयुक्त हर साल विधानसभा को अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं। इन रिपोर्टों में सुझाव होते हैं, जिनके जरिए इस कानून को बेहतर बनाया जा सकता है। दुखद है कि अब तक इन रिपोर्टों पर ध्यान ही नहीं दिया है जबकि जरूरत इस बात की है कि इन रिपोर्टों के आधार पर एक एक्शन टेकन रिपोर्ट हर साल पेश किया जाना चाहिए। बहरहाल, यह एक ऐतिहासिक कानून है और इस पर निगरानी के लिए एक सक्रिय नागरिक समाज की जरूरत है।

आरटीआई के बारे में ही लोगों को बहुत कम जानकारी है। शहर में कुछेक जानते भी हैं तो गांव के गांव अनजान हैं। इसके लिए पंचायत स्तर पर एक सूचना सहायता केंद्र खोलना जरूरी है। संसद से ले कर पंचायतों के कामकाज का कम्प्यूटरीकरण बाकी है। सरकारी या सरकारी मदद से चलने वाली संस्थाओं को अपने नियमों की जानकारी 120 दिनों के भीतर ऑनलाइन करने का काम नहीं हुआ है। सूचना छिपाने की गुंजाइश खोजने वाले अफसरों को प्रशिक्षित किया जाना है। फिर केंद्र-राज्य सूचना आयुक्तों की वाषिर्क सिफारिश रिपोटरे पर भी एक्शन लिया जाना है